Sunnat tareeqe se namaz e nabvi ﷺ

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Sunnat tareeqe se namaz e nabvi ﷺ

Mohib Tahiri /محب طاہری
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*🌺🌷ﺑِﺴْـــــــــــــﻢِﷲِالرَّحْمٰنِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🌺


नमाज़ी क़िब्ला की और मुँह करे 

नमाज़ पढ़ने वाला जहाँ कही भी हो अपने पुरे शरीर के साथ क़िब्ला (काअबा) की दिशा की तरफ़ हो जाएँ।

बरा बिन आजिब रजि. फ़रमाते है :"हम ने अल्लाह के रसूल सलल्लाहु अल्लैही व सल्लम के साथ 16 (सोलह) या 17 (सत्रह) महीने तक बैतुल-मक्दिस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ी, फिर अल्लाह तआला ने हमें काअबा की तरफ मुँह करने का हुक्म दिया"

(सही बुख़ारी : 4492)

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नमाज़ की निय्यत करे !

नमाज़ी फर्ज़, सुन्नत या नफ़्ल जो नमाज़ पढ़ने का इरादा रखता हो अपने दिल में उसकी नियत करे, निय्यत दिल के इरादे का नाम हैं। अपनी ज़बान से नियत के शब्द न निकाले, क्योंकि ज़ुबान से नियत करना किताब व सुन्नत से साबित नहीं।

रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़र्माया : 

"तमाम आमाल का दारोमदार निय्यत पर है और हर अमल का नतीजा हर इंसान को इस की निय्यत के मुताबिक़ ही मिलेगा.........."

(सही बुख़ारी : 1) 

किब्ला रुख खड़े होने के बाद तकबीरे-तहरीमा "अल्लाहु अकबर" कहे !

नमाज़ पढ़ने वाले को चाहिए की सज्दा के स्थान पर अपनी निगाह रखते हुए "अल्लाहु अकबर" कहे।

हजरत अबु हमीद साअदी से रिवायत है इन्होंने फ़र्माया "रसूलुल्लाह सलल्लाहु अल्लैही व सल्लम जब नमाज़ की लिए खड़े होते तो क़िब्ले की तरफ़ मुँह करते, अपने दोनों हाथ उठाते और 'अल्लाहु अकबर' कहते"

(सुनन इब्ने माजह : 803)

'अल्लाहु अकबर' कहते वक़्त अपने दोनों हाथ कंधो या कानो के बराबर उठाएं अर्थात रफअयदैन करे !

हजरत वाइल बिन हुज्र रजि. फ़रमाते है "मैने रसूलुल्लाह सलल्लाहु अल्लैही व सल्लम के पीछे नमाज़ पढ़ी। जब आपने नमाज़ शुरू फ़रमाई तो "अल्लाहु अकबर" कहा और अपने हाथ उठाये हत्ता के वो कानो के बराबर हो गये फ़िर आप ने सुरः फ़ातिहा पढ़ी, जब सुरः से फारिग हुए तो बुलन्द आवाज़ से आमीन कहीँ"

(सुनन एन-निसाई : 880)

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रफअयदैन के तमाम मकामात।


रफअयदैन नमाज़ में चार जगह साबित है :


1. शुरू नमाज़ में तकबीरे-तहरीमा कहते वक़्त,

2. रूकूअ से पहले, 

3. रुकूअ के बाद, 

4. और तीसरी रकअत के शुरू में।

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हज़रत अली बिन अबी तालिब रजि. से रिवायत है, वो रसूलुल्लाह सलल्लाहु अल्लैही व सल्लम से बयान करते है के "आप जब फर्ज़ नमाज़ के लिए खड़े होते तो 'अल्लाहु अकबर' कहते और अपने दोनों हाथ कंधो तक उठाते, और जब अपनी किरअत पूरी कर लेते और रूकूअ करना चाहते तो इसी तरह हाथ उठाते और जब रूकूअ से उठते तो इसी तरह करते, और नमाज़ में बैठे हुवे होने की हालत में रफअयदैन न करते थे और जब दो रकअत पढ़ कर उठते तो अपने हाथ उठाते और 'अल्लाहु अकबर' कहते"

(सुनन अबु दाऊद : 744) 


(B) रफअयदैन करते समय उंगलिया (नार्मल तरीक़े पर) खुली रखे, उंगलियो के बीच ज़्यादा फ़ासला न करे न उंगलिया मिलाएं।


अबु हुरैरह रजि. ने फ़र्माया : तीन काम ऐसे है जिन्हें रसूलुल्लाह सलल्लाहु अल्लैही व सल्लम किया करते थे, लोगो ने इन्हें तर्क कर दिया है, आप जब नमाज़ के लिए खड़े होते तो आप ऐसे करते, अबु आमिर ने अपने हाथ से इशारा किया कर के दिखाया और अपनी उंगलियो के दरम्यान न ज़्यादा फ़ासला रखा और न इन्हें मिलाया (बल्कि दरम्यानी हालत में रखा)............................."

(सही इब्ने खुज़ैमा : 459)

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