Dua aur pukar ek ibadat hai

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Mohib Tahiri /محب طاہری
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 Dua aur pukar ek ibadat hai




शिर्क और तौहीद (पार्ट - 16)

आज का हमारा मौज़ू है —
दुआ एक इबादत है....!!
‘दुआ‘ और ‘पुकार‘ का 'इबादत होना'
आज के मुशरिकीन कहता हैं के मैं सिवाए अल्लाह के किसी की इबादत नहीं करता और नेक लोगों की पनाह लेना और तंगी व तकलीफ़ में मुश्किल कुशाई के लिए उन्हे पुकारना कोई इबादत तो नहीं।
जवाब :
हज़रत-नौमांन-बिन-बशीर (रज़ि अल्लाहु अन्हु) से रिवायत है रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया दुआ एक इबादत है। फ़िर आपने सुरह मोमिन की आयत नं 60 पढ़ी, तुम्हारे परवरदिगार ने फ़रमाया मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा और जो लोग मेरी दुआ से तकब्बुर करते हैं वो ज़लील ओ ख़्वार होकर जहन्नुम मैं दाख़िल होंगे ।
[जामे तिर्मिज़ी, वॉल्यूम - नंबर: 2,
किताब: (किताब-उल-दुआ), हदीस-नं: 1297]
मफ़हूम ऐ हदीस:-
°°°°°°°°°°°°°°°° हजरत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि0) का बयान है कि एक दिन मैं अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) के पीछे सवारी पर बैठा था कि आपने फऱमायाः
तुम अल्लाह के अहकाम की हिफ़ाज़त करो, वह तुम्हारी हिफ़ाज़त फ़रमाए गा, तो अल्लाह के हक़ूक़ का ख़्याल रखो उसे तुम अपने सामने पाओगे, जब तुम कोई चीज़ माँगो तो सिर्फ़ अल्लाह से माँगो, जब तुम मदद चाहो तो सिर्फ़ अल्लाह से मदद तलब करो और यह बात जान लो के अगर सारी उम्मत भी जमा होकर तुम्हें कुछ नफ़ा पहुंचाना चाहे तो तुम्हें उससे ज़्यादा कुछ भी नफ़ा नहीं पहुँचा सकती जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है और अगर वह तुम्हें कुछ नुक़सान पहुँचाने के लिए जमा हो जाए तो उससे ज़्यादा कुछ नुक़सान नहीं पहुँचा सकते जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है, क़लम उठा लिए गए और (तक़दीर के) सहीफ़े ख़ुश्क़ हो गए हैं।
[तिर्मिज़ी : 2516]
【नोट:- मज़ारों पर चादर चढ़ाना और क़ब्र परस्ती की हक़ीक़त मेरी एक पुरानी पोस्ट का दर्जे जील लिंक पे जाकर मुशाहिदा करें...
दूसरी एक हदीस में आता है कि –
प्यारे नबी (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “दुआ इबादत है”, फिर नबी (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने ये आयत पढ़ी-
“और तुम्हारा परवरदिगार इर्शाद फ़रमाता है- “तुम मुझसे दुआएं माँगों मैं तुम्हारी (दुआ) क़ुबूल करूँगा, बेशक जो लोग हमारी इबादत से तकब्बुर करते (अकड़ते) हैं वह अनक़रीब ही ज़लील व ख़्वार हो कर यक़ीनन जहन्नुम मे दाख़िल होंगे”
(सुरह ग़ाफ़िर आयत 60)
(जामे तिर्मिज़ी - 3555)
तो याद रहे: अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नही और दुआ इबादत है , और जब दुआ इबादत है तो इबादत के तमाम तरीक़े नबी (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने अपनी उम्मत को बता दिए है.... लिहाज़ा अगर हम दुनिया और आख़िरत की हक़ीक़ी कामयाबी चाहते है तो इबादत में वोही अमल करे जिसकी तालीम नबी (सलाल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने हमे दी है, जो कुरानो सुन्नत से साबित हो ,..
यहीं पे इस सीरीज़ का समापन करता हूँ।
अल्लाह तआला से दुआ है की:
— पोस्ट लिखने में मुझसे जो ग़लती हुईं हो, उस पर मेरी पकड़ ना करना, अपने रहम से मुझे माफ़ फ़रमा दे
– हमे कहने सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक अता फ़रमा
– हम सबको दींन की सही समझ अता फरमा
– जब तक हमे ज़िन्दा रख, इस्लाम और ईमान पर ज़िन्दा रख
– ख़ात्मा हमारा ईमान पर हो
— इस पोस्ट के सेंट्रल आईडिये को उम्मत को समझने की तौफ़ीक़ दे।
वा आख़िरू दावाना अल्लिह्मुद्लिल्लाही रब्बिल आलमीन !!!
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