✔️Tauheed aur shirk/तौहीद और शिर्क part:1

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✔️Tauheed aur shirk/तौहीद और शिर्क part:1

Mohib Tahiri /محب طاہری
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Tauheed aur shirk



शिर्क क्या है ?
अल्लाह तआला फ़रमाता हैं :
बेशक अल्लाह नहीं बख़्शेगा की उस के साथ शिर्क किया जाए और बख़्श देगा जो इस के इलावा होगा, जिसे वो चाहेगा। और जो कोई अल्लाह के साथ शिर्क करे, तो वो गुमराही मे बहुत दूर निकल गया।
{सूरह निसा, आयत 116}
हालांकि शिर्क से मुताल्लिक़ और भी बहुत सी आयत इस सूरह से पीछे गुज़र चुकी हैं लेकिन ये आयत बहुत ही अहम है जिसमें शिर्क करने वाले की माफ़ी की कोई उम्मीद नहीं।
शिर्क क्या है ?
शिर्क का लुग़्वी माना होता है, शरीक करना अल्लाह के सिवा किसी मख़लूक को, इबादत, मुहब्बत, ताज़ीम मे, अल्लाह के बराबर समझना। अल्लाह तआला की मख़सूस सिफ़ात मे
मसलन:- ख़ालिक, राज़िक़, हाजत रवा, मुश्किल कुशा।
अल्लाह तआला की इन सिफ़ात मे किसी और को शरीक समझना की कोई और भी ये सब कुछ कर सकता है।
“सबसे बड़ा गुनाह ये है के तू अल्लाह के साथ किसी को शरीक करे हालांकि उसने तुझे पैदा किया।”
{सही बुख़ारी 4477, मुस्लिम 86}
क़यामत के दिन मुशरिकीन कहेंगे :
“अल्लाह की क़सम हम खुली गुमराही मे थे जब हम तुमको रब्बुल आलमीन के बराबर क़रार देते थे.”
{सूरह अशुरा ,आयत 97-98}
इसका मतलब अल्लाह के बराबर किसी को क़रार देना, उसकी ज़ात में, उसकी सिफ़ात मे, उसके हुक़ूक़ मे, उसके इख़्तियारात मे, यही शिर्क कहलाता है।
शिर्क को ज़ुल्म भी कहा गया है। ज़ुल्म किसी के हक़ मे कमी के लिए इस्तेमाल होता है। अल्लाह का हक़ ये है कि उसके बराबर किसी को ना समझा जाए, किसी भी चीज़ में, उसकी किसी भी सिफ़ात में, उसकी हस्ती के किसी भी पहलू मैं।
और अगर कोई ऐसा करे तो वो ऐसे गुनाह का ऐतक़ाब कर रहा है कि जिसकी माफ़ी नहीं। याद रखिये की गुनाह कई क़िस्म के है। कुछ ऐसे हैं जो इंसान भूल-चूक मे ख़ता कर जाता है और फ़िर उस के बाद नेकी करता है तो हर नेकी ख़ता को मिटा देती है।
कुछ गुनाह ऐसे है के जिन के लिए सिर्फ़ नेकी करना काफ़ी नहीं बल्कि उनकी बातौर ए ख़ास माफ़ी मांगा भी ज़रूरी है। जब इंसान उन गुनाहो पर माफ़ी मांगता है तो वो माफ़ हो जाते हैं। कुछ गुनाह ऐसे है की जिन पर सिर्फ़ माफ़ी भी काफ़ी नहीं जब तक के इंसानों उन हक़ों की अदायगी न करे जो वो किसी के हक़ में मार रहा है;
मसलन :- किसी की चोरी की या किसी की इल्ज़ाम-तराशी की। तो ऐसे में जब तक के वो चीज़ साहिब ए हक़ को वापस ना की जाए, उसका नुक़सान पुरा ना किया जाए, उस शख़्स से माफ़ी न मांगी जाए जैसे हुक़ूक़ उल इबाद में कोताही, तो उस वक़्त तक वो गुनाह माफ़ नहीं होते। तो शिर्क भी उन गुनाहो मैं से एक गुनाह है की जिस पर इंसान जबतक सच्चे दिल से माफ़ी मांग कर फिर आइंदा के लिए वो काम छोड़ नहीं देता उस वक़्त तक माफ़ी नहीं हो सकती ।
इस पार्ट को यही रोकते हैं,
जुड़े रहें....
इस नुक़्ते पर मज़ीद गुफ्तगूं इन्शाअल्लाह अगले पार्ट में पेश की जायेगी।
अल्लाह हम सब उम्मतियो को हक़ बात क़बूल करने की तौफ़ीक़ अता करे।
आमीन या रब्बुल आलमीन
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